Friday, 12 April 2013

बस तेरी याद ही काफी है मुझे


हिज्र की सब का सहारा भी नहीं 
अब फलक पर कोई तारा भी नहीं 

बस तेरी याद ही काफी है मुझे 
और कुछ दिल को गवारा भी नहीं 

जिसको देखूँ तो मैं देखा ही करूँ 
ऐसा अब कोई नजारा भी नहीं 

डूबने वाला अजब था कि मुझे 
डूबते वक्त पुकारा भी नहीं 

कश्ती ए इश्क वहाँ है मेरी 
दूर तक कोई किनारा भी नहीं 

दो घड़ी उसने मेरे पास आकर 
बारे गम सर से उतारा भी नहीं

कुछ तो है बात कि उसने साबिर 
आज जुल्फों को सँवारा भी नहीं।

साबिर इंदौरी

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