Friday, 12 April 2013

तुम याद बेहिसाब आए


तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं 
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं 


-फ़ैज़ 

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए


-फ़ैज़ 

यूँ तो हिलता ही नहीं घर से किसी वक़्त 'अदम' 
शाम के वक़्त न मालूम किधर जाता है 


-'अदम'

आइये कोई नेक काम करें 
आज मौसम बड़ा गुलाबी है 


-'अदम'

रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे 
कट गई उम्र रात बाक़ी है 


ख़ुमार 

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी यारब कई दिए होते 


-ग़ालिब 

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम 
पर क्या करें के हो गए नाचार जी से हम 


मोमिन 

तुम मेरे पास होते हो गोया


                               जब कोई दूसरा नहीं होता


-मोमिन 

तेरे कूंचे इस बहाने मुझे दिन से रात करना 
कभी इससे बात करना, कभी उससे बात करना


-मसहफ़ी 

मसहफ़ी हम तो ये समझे थे के होगा कोई ज़ख़्म 
तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला -


मसहफ़ी 

हम हुए तुम हुए के मीर हुए 
उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए-

-मीर तक़ी मीर

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