तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
-फ़ैज़
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आए
-फ़ैज़
यूँ तो हिलता ही नहीं घर से किसी वक़्त 'अदम'
शाम के वक़्त न मालूम किधर जाता है
-'अदम'
आइये कोई नेक काम करें
आज मौसम बड़ा गुलाबी है
-'अदम'
रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
कट गई उम्र रात बाक़ी है
ख़ुमार
मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी यारब कई दिए होते
-ग़ालिब
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
पर क्या करें के हो गए नाचार जी से हम
मोमिन
तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
-मोमिन
तेरे कूंचे इस बहाने मुझे दिन से रात करना
कभी इससे बात करना, कभी उससे बात करना
-मसहफ़ी
मसहफ़ी हम तो ये समझे थे के होगा कोई ज़ख़्म
तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला -
मसहफ़ी
हम हुए तुम हुए के मीर हुए
उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए-
-मीर तक़ी मीर
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